Tulsidas biography In Hindi-तुलसीदास जीवनी हिंदी में

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Tulsidas biography In Hindi

गोस्वामी तुलसीदास (1511 – 1623) हिंदी साहित्य के महान कवी थे | इन्हें  महर्षि वाल्मीकि का भी अवतार माना जाता है तुलसीदास को हमेशा वाल्मिकी (संस्कृत में रामायण और हनुमान चालीसा के वास्वतिक रचयिता) के अवतरण के रुप में प्रशंसा मिली |

Tulsidas biography In Hindi जन्म :-

तुलसीदास जी का जन्म स्थान विवादित है | इनका जन्म विक्रम संवत के अनुसार वर्ष 1554 में हुआ था लेकिन कुछ का मानना है कि तुलसीदास का जन्म वर्ष 1532 हुआ था। तुलसीदास का जन्म श्रावण मास के सातवें दिन में चमकदार अर्ध चन्द्रमा के समय पर हुआ था। उत्तर प्रदेश के यमुना नदी के किनारे राजापुर (चित्रकुट) को तुलसीदास का जन्म स्थान माना जाता है। इनके माता-पिता का नाम हुलसी और आत्माराम दुबे था

जहाँ बच्चे नो महीने तक माँ के गर्भ में रहते है वही तुलसीदास जी बारह महीने  गर्भ में थे इनके जन्म से ही दांत निकले हुए थे | इन्होने जन्म के साथ ही राम नाम का उच्चारण किया जिसकी वजह से इनका नाम रामबोला पड़ा |इनके जनम के एक से दो दिन बाद ही इनकी माँ का निधन हो गया अतः पिता ने कही और अनिष्ट न हो जाये ऐसा सोचकर चुनिया नाम की एक औरत को इनको सौप दिया | चुनिया ने तुलसीदास के पांच वर्ष होने तक उसकी देखभाल करी उसके बाद वह भी चल बसी | और तुलसीदास जी अनाथो की तरह जीवन जीने को मजबूर हो गये |

Tulsidas biography In Hindi बचपन :

अनन्तानन्द जी के प्रिय शिष्य नरहरि बाबा ने इस रामबोला के नाम से बहुचर्चित हो चुके इस बालक को ढूँढ निकाला और विधिवत उसका नाम तुलसीराम रखा | वे उसे अयोध्या ले गये और जहाँ माघ शुक्ल पंचमी (1561) को उनका यज्ञोपवित संस्कार पूरा कराया | संस्कार के वक्त भी रामबोला ने बिना सिखाये गायत्री मंत्र का उच्चारण एकदम शुद्ध किया,रामबोला की बुद्धि बहुत तेज थी । वह एक ही बार में गुरु-मुख से जो सुन लेता, उसे वह कंठस्थ हो जाता। वहाँ से कुछ काल के बाद गुरु-शिष्य दोनों सोरों पहुँचे। वहाँ नरहरि बाबा ने बालक को राम-कथा सुनायी किन्तु वह उसे सही से समझ न आयी।

Tulsidas biography In Hindi वैवाहिक जीवनी:

तुलसीदास का विवाह रत्नावली नाम की कन्या से वर्ष 1583 में ज्येष्ठ महीने (मई या जून का महीना) में हुआ था। चुकी गौना नहीं होने की वजह से वे कशी चले गये थे और वहा वेदों की शिक्षा ग्रहण करने लगे | एक बार जब उन्हें पत्नी की याद आयी तो वे राजापुर लौट आये और यमुना नदी को पार कर के सीधे अपनी पत्नी के कक्ष में पहुच गये | तुलसीदास की इस कृत्य से बहुत दुखी हुयी और उन्हें जिम्मेदार ठहराते हुये कहा कि अपने आप को ईश्वर के प्रति पूरी तरह समर्पित कर दो। रत्नावली की इस सिख से ही तुलसीराम “तुलसीदास” बने |

जब वह वापिस अपने गाँव लौटकर आये तब तक उनके पिता का भी देहांत हो चूका था , उन्हें बहुत दुःख हुआ | उन्होंने विधि-पूर्वक अपने पिता जी का श्राद्ध किया और गाँव में ही रहकर लोगों को भगवान राम की कथा सुनाने लगे |

भगवान राम जी से भेंट :-

कुछ समय राजापुर रहने के बाद वे फिर काशी लौट आये और वही पर भक्तो को राम कथा सुनाने लगे | कुछ समय बाद उन्हें वहाँ एक प्रेत मनुष्य के रूप में मिला जिसने उनको हनुमान जी का पता बताया | जब तुलसीदास जी हनुमान जी से मिले तो उनसे भगवान राम जी के दर्शनों की इच्छा जताई | तो हनुमान जी ने कहा की तुम चित्रकूट चले जाओ वहा तुम्हे भगवान के दर्शन होंगे | वे चित्रकूट के लिए रवाना हो गये |

वहाँ पहुचकर उन्होंने राजघाट पर अपना आसन जमाया | जब वह पैदल घूम रहे थे तब उन्होंने देखा की दो सुन्दर राजकुमार एक घोड़े पर जा रहे है वे उन्हें देखकर आकर्षित तो हुए लेकिन भगवान को पहचान न सके | जब हनुमान जी ने उन्हें सच बताया तो उन्हें बहुत दुःख हुआ |

इस पर हनुमान जी ने कहा की सब्र करो कल फिर से दर्शन होंगे |

वर्ष 1607 बुधवार मोनी अमावश्या के दिन भगवान पुनः प्रकट हुए | भगवान बालक के रूप में आये और तुलसीदास जी से चन्दन माँगा ” है बाबाजी ! हमे चन्दन चाहिए ”

भगवान हनुमान जी की असीम कृपा से वे भगवान राम को पहचानने में सफल रहे और उन्हें उनकी अद्भुत छवि को देखकर अपनी सुध-बुध ही भूल गये | आखिर भगवान राम ने चन्दन लेके खुद ही तुलसीदास जी के माथे पर लगाया और अंतर्ध्यान हो गये | विनयपत्रिका में तुलसीदास ने चित्रकूट में हुये चमत्कार के बारे में बताया है साथ ही भगवान श्रीराम का धन्यवाद भी किया है।

तुलसीदास जी की साहित्यिक रचना :-

वर्ष 1628 में वह भगवान हनुमान जी की आज्ञा पाकर अयोध्या की और चल पड़े | वे वहाँ संस्कृत में पद्य-रचना करने लगे। परन्तु दिन में वे जितने रचना करते वे रात्रि को सब लुप्त हो जाती | ये सब रोज हो रहा था | आठवें दिन उनके सामने भगवान शंकर और माता पार्वती प्रकट हुए | तुलसीदास जी ने उन्हें प्रणाम किया | इस पर भगवान ने उनसे कहा की तुम अयोध्या जाकर रहो और अपनी भाषा (हिंदी ) में काव्य की रचना करो | भगवान की आज्ञा पाकर उन्होंने वेसा ही किया |

रामचरितमानस की रचना:-

इस महाकाव्य को तुलसीदास जी ने वर्ष 1631 में चैत्र मास के रामनवमी पर अयोध्या में लिखना शुरू किया था | इसे लिखने में तुलसीदास जी को 2 वर्ष , 7 महीने, और 26 दिन का समय लगा और यह मार्गशीर्ष महीने के विवाह पंचमी (राम-सीता का विवाह) पर संपन्न हुआ |

इसको पूरा करने के बाद तुलसीदास काशी आये और यहाँ  के विश्वनाथ मंदिर में भगवान शिव और माता पार्वती को महाकाव्य रामचरितमानस सुनाया। रात को पुस्तक मंदिर में रख दी गयी जब सुबह पंडित जी ने मंदिर के पट खोले तो पुस्तक पर “सत्यम शिवम् सुन्दरम ” लिखा हुआ पाया गया | और निचे भगवान शंकर जी की पुष्ठी थी |

मृत्यु:

तुलसीदास की मृत्यु सन् 1680 में श्रावण कृष्ण तृतीया शनिवार के दिन  गंगा नदी के किनारे अस्सी घाट पर हुआ। उन्होंने अपनी अंतिम कृति विनय-पत्रिका लिखी और उसे भगवान के चरणों में समर्पित कर दिया |

 तुलसीदास जी की कुछ रचनाये:

1.      रामचरितमानस

2.      गीतावली

3.      कवितावली

4.      श्रीकृष्ण-गीतावली

5.      विनय-पत्रिका

6.      सतसई

7.      छंदावली रामायण

8.      कुंडलिया रामायण

9.       राम शलाका

10.    रामललानहछू

11.    वैराग्य-संदीपनी

12.    बरवै रामायण

13.    पार्वती-मंगल

14.    जानकी-मंगल

15.    रामाज्ञाप्रश्न

16.   दोहावली

17.    संकट मोचन

18.    करखा रामायण

19.    रोला रामायण

20.    झूलना

21.    छप्पय रामायण

22.    कवित्त रामायण

23.    कलिधर्माधर्म निरूपण

24.   हनुमान चलीसा

 

हमने सम्पूर्ण जानकारी के साथ यह लेखन लिखने की कोशिश की है | आशा करता हूँ  आपको यह पसंद आएगी | आपके कोई भी विचार हो हमे कमेंट करके जरुर बताये | धन्यवाद |

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