kabir ke dohe pdf-संत कबीर के दोहे हिंदी में

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kabir ke dohe pdf (E-book)

आइये शुरू करते है :- kabir ke dohe pdf

“गुरु गोविंद दोउ खड़े, काके लागूं पाँय 
बलिहारी गुरु आपने, गोविंद दियो बताय “
भावार्थ:- कबीर दास जी इस दोहे में कहते हैं कि अगर हमारे सामने गुरु और भगवान दोनों एक साथ खड़े हों तो हम किसके चरण स्पर्श करेंगे? गुरु ने अपने ज्ञान से ही हमें भगवान से मिलने का रास्ता बताया है इसलिए गुरु की महिमा भगवान से भी ऊपर है अतः हमें गुरु के ही चरण स्पर्श करने चाहिए।
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“यह तन विष की बेलरी, गुरु अमृत की खान 
शीश दियो जो गुरु मिले, तो भी सस्ता जान “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि यह जो शरीर है वो विष (जहर) से भरा हुआ है और गुरु अमृत की खान हैं। अतःअपना सिर (माथा  देने के बदले में आपको कोई सच्चा गुरु मिले तो ये सौदा भी बहुत सस्ता है।
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“सब धरती काजग करू, लेखनी सब वनराज 
सात समुद्र की मसि करूँ, गुरु गुण लिखा न जाए “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि अगर मैं इस पूरी धरती के बराबर बड़ा कागज बना लू और संसार के सभी वृक्षों की कलम बना लूँ और सातों समुद्रों के बराबर स्याही बना लूँ तो भी गुरु के गुणों को लिखना संभव नहीं है।
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“ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोये 
औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होए “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि इंसान को ऐसी भाषा बोलनी चाहिए जो सुनने वाले के मन को अच्छी लगे। ऐसी भाषा दूसरे लोगों को तो सुख पहुँचाती ही है, इसके साथ खुद को भी बड़े आनंद का अनुभव होता है।

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“निंदक नियेरे राखिये, आँगन कुटी छावायें 
बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुहाए “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि निंदक हमेशा दूसरों की बुराइयाँ करने वाले लोगों को हमेशा अपने पास रखना चाहिए, क्यूंकि ऐसे लोग अगर आपके पास रहेंगे तो आपकी बुराइयाँ आपको बताते रहेंगे और आप आसानी से अपनी गलतियां सुधार सकते हैं। इसीलिए कबीर जी ने कहा है कि निंदक लोग इंसान का स्वभाव शीतल बना देते हैं।
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“दुःख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय 
जो सुख में सुमिरन करे, तो दुःख काहे को होय “
भावार्थ:- दुःख में हर व्यक्ति भगवान को याद करता है लेकिन सुख में सब भगवान को भूल जाते हैं। अगर सुख में भी भगवान को याद करो तो दुःख कभी आएगा ही नहीं।
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“माटी कहे कुमार से, तू क्या रोंदे मोहे 
एक दिन ऐसा आएगा, मैं रोंदुंगी तोहे “
भावार्थ:- जब कुम्हार बर्तन बनाने के लिए मिटटी को रौंद रहा था, तो मिटटी कुम्हार से कहती है की  – तू मुझे क्या  रौंद रहा है, एक दिन ऐसा आएगा जब तू इसी मिटटी में विलीन हो जायेगा और मैं तुझे रौंदूंगी।
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“पानी केरा बुदबुदा, अस मानस की जात 
देखत ही छुप जाएगा है, ज्यों सारा परभात “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि इंसान की इच्छाएं एक पानी के बुलबुले के समान हैं जो पल भर में बनती हैं और पल भर में खत्म। जिस दिन आपको सच्चे गुरु के दर्शन होंगे उस दिन ये सब मोह माया और सारा अंधकार छिप जायेगा।
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“चलती चक्की देख के, दिया कबीरा रोये 
दो पाटन के बीच में, साबुत बचा न कोए “
भावार्थ:- चलती चक्की को देखकर कबीर दास जी के आँसू निकल आते हैं और वो कहते हैं कि चक्की के  पाटों के बीच में कुछ साबुत नहीं बचता।

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“मलिन आवत देख के, कलियन कहे पुकार 
फूले फूले चुन लिए, कलि हमारी बार “
भावार्थ:- मालिन को आते देखकर बगीचे की कलियाँ आपस में बातें करती हैं कि आज मालिन ने फूलों को तोड़ लिया और कल हमारी बारी आ जाएगी। अथार्थ आज आप जवान हैं, कल आप भी बूढ़े हो जायेंगे और एक दिन मिटटी में मिल जाओगे। आज की कली, कल फूल बनेगी।
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“काल करे सो आज कर, आज करे सो अब 
पल में परलय होएगी, बहुरि करेगो कब “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि हमारे पास समय बहुत कम है, जो काम कल करना है वो आज करो, और जो आज करना है वो अभी करो, क्योंकि पलभर में प्रलय हो जाएगी फिर आप अपने काम कब करेंगे।
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“ज्यों तिल माहि तेल है, ज्यों चकमक में आग 
तेरा साईं तुझ ही में है, जाग सके तो जाग “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं जैसे तिल के अंदर तेल होता है, और आग के अंदर रौशनी होती है ठीक वैसे ही हमारा ईश्वर हमारे अंदर ही विद्धमान है, अगर ढूंढ सको तो ढूढ लो।
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“जहाँ दया तहा धर्म है, जहाँ लोभ वहां पाप 
जहाँ क्रोध तहा काल है, जहाँ क्षमा वहां आप “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि जहाँ दया है वहीँ धर्म है और जहाँ लोभ है वहां पाप है, और जहाँ क्रोध है वहां सर्वनाश है और जहाँ क्षमा है वहाँ ईश्वर का वास होता है।
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“जो घट प्रेम न संचारे, जो घट जान सामान 
जैसे खाल लुहार की, सांस लेत बिनु प्राण “
भावार्थ:- जिस इंसान अंदर दूसरों के प्रति प्रेम की भावना नहीं है वो इंसान पशु के समान है।


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“जल में बसे कमोदनी, चंदा बसे आकाश 
जो है जा को भावना सो ताहि के पास “
भावार्थ:- कमल जल में खिलता है और चन्द्रमा आकाश में रहता है। लेकिन चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब जब जल में चमकता है तो कबीर दास जी कहते हैं कि कमल और चन्द्रमा में इतनी दूरी होने के बावजूद भी दोनों कितने पास है। जल में चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब ऐसा लगता है जैसे चन्द्रमा खुद कमल के पास आ गया हो। वैसे ही जब कोई इंसान ईश्वर से प्रेम करता है वो ईश्वर स्वयं चलकर उसके पास आते हैं।
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“जात न पूछो साधू की, पूछ लीजिये ज्ञान 
मोल करो तलवार का, पड़ा रहने दो म्यान “
भावार्थ:- साधु से उसकी जाति मत पूछो बल्कि उनसे ज्ञान की बातें करिये, उनसे ज्ञान लीजिए। मोल करना है तो तलवार का करो म्यान को पड़ी रहने दो।
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“जग में बैरी कोई नहीं, जो मन शीतल होए 
यह आपा तो डाल दे, दया करे सब कोए “
भावार्थ:- अगर आपका मन शीतल है तो दुनियां में कोई आपका दुश्मन नहीं बन सकता |
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“तीरथ गए से एक फल, संत मिले फल चार 
सतगुरु मिले अनेक फल, कहे कबीर विचार “
भावार्थ:- तीर्थ करने से एक पुण्य मिलता है, लेकिन संतो की संगति से  पुण्य मिलते हैं। और सच्चे गुरु के पा लेने से जीवन में अनेक पुण्य मिल जाते हैं
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“प्रेम न बारी उपजे, प्रेम न हाट बिकाए 
राजा प्रजा जो ही रुचे, सिस दे ही ले जाए “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि प्रेम कहीं खेतों में नहीं उगता और नाही प्रेम कहीं बाजार में बिकता है। जिसको प्रेम चाहिए उसे अपना शीशक्रोध, काम, इच्छा, भय त्यागना होगा।

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“जिन घर साधू न पुजिये, घर की सेवा नाही 
ते घर मरघट जानिए, भुत बसे तिन माही “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि जिस घर में साधु और सत्य की पूजा नहीं होती, उस घर में पाप बसता है। ऐसा घर तो मरघट के समान है जहाँ दिन में ही भूत प्रेत बसते हैं।
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“प्रेम पियाला जो पिए, सिस दक्षिणा देय 
लोभी शीश न दे सके, नाम प्रेम का लेय “
भावार्थ:- जिसको ईश्वर प्रेम और भक्ति का प्रेम पाना है उसे अपना शीशकाम, क्रोध, भय, इच्छा को त्यागना होगा। लालची इंसान अपना शीशकाम, क्रोध, भय, इच्छा तो त्याग नहीं सकता लेकिन प्रेम पाने की उम्मीद रखता है।
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“कबीरा सोई पीर है, जो जाने पर पीर 
जो पर पीर न जानही, सो का पीर में पीर “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि जो इंसान दूसरे की पीड़ा और दुःख को समझता है वही सज्जन पुरुष है और जो दूसरे की पीड़ा ही ना समझ सके ऐसे इंसान होने से क्या फायदा।
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“कबीरा ते नर अँध है, गुरु को कहते और 

हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रूठे नहीं ठौर “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि वे लोग अंधे और मूर्ख हैं जो गुरु की महिमा को नहीं समझ पाते। अगर ईश्वर आपसे रूठ गया तो गुरु का सहारा है लेकिन अगर गुरु आपसे रूठ गया तो दुनियां में कहीं आपका सहारा नहीं है।
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“नहीं शीतल है चंद्रमा, हिम नहीं शीतल होय 

कबीर शीतल संत जन, नाम सनेही होय “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि चन्द्रमा भी उतना शीतल नहीं है और हिमबर्फ भी उतना शीतल नहीं होती जितना शीतल सज्जन पुरुष हैं। सज्जन पुरुष मन से शीतल और सभी से स्नेह करने वाले होते हैं।

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“पोथी पढ़ पढ़ जग मुआ, पंडित भया न कोय 

ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि लोग बड़ी से बड़ी पढाई करते हैं लेकिन कोई पढ़कर पंडित या विद्वान नहीं बन पाता। जो इंसान प्रेम का ढाई अक्षर पढ़ लेता है वही सबसे विद्वान् है।
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“राम बुलावा भेजिया, दिया कबीरा रोय 

जो सुख साधू संग में, सो बैकुंठ न होय “
भावार्थ:- जब मृत्यु का समय नजदीक आया और राम के दूतों का बुलावा आया तो कबीर दास जी रो पड़े क्यूंकि जो आनंद संत और सज्जनों की संगति में है उतना आनंद तो स्वर्ग में भी नहीं होगा।
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“शीलवंत सबसे बड़ा सब रतनन की खान 

तीन लोक की सम्पदा, रही शील में आन “
भावार्थ:- शांत और शीलता सबसे बड़ा गुण है और ये दुनिया के सभी रत्नों से महंगा रत्न है। जिसके पास शीलता है उसके पास मानों तीनों लोकों की संपत्ति है।
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“साईं इतना दीजिये, जामे कुटुंब समाये 

मैं भी भूखा न रहूँ, साधू न भूखा जाए “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि हे प्रभु मुझे ज्यादा धन और संपत्ति नहीं चाहिए, मुझे केवल इतना चाहिए जिसमें मेरा परिवार अच्छे से खा सके। मैं भी भूखा ना रहूं और मेरे घर से कोई भूखा ना जाये।
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“माखी गुड में गडी रहे, पंख रहे लिपटाए 

हाथ मेल और सर धुनें, लालच बुरी बलाय “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि मक्खी पहले तो गुड़ से लिपटी रहती है। अपने सारे पंख और मुंह गुड़ से चिपका लेती है लेकिन जब उड़ने प्रयास करती है तो उड़ नहीं पाती तब उसे अफ़सोस होता है। ठीक वैसे ही इंसान भी सांसारिक सुखों में लिपटा रहता है और अंत समय में अफ़सोस होता है।

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“ज्ञान रतन का जतन कर, माटी का संसार 

हाय कबीरा फिर गया, फीका है संसार “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि ये संसार तो माटी का है, आपको ज्ञान पाने की कोशिश करनी चाहिए नहीं तो मृत्यु के बाद जीवन और फिर जीवन के बाद मृत्यु यही क्रम चलता रहेगा।
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“कुटिल वचन सबसे बुरा, जा से होत न चार 

साधू वचन जल रूप है, बरसे अमृत धार “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि कड़वे बोल बोलना सबसे बुरा काम है, कड़वे बोल से किसी बात का समाधान नहीं होता। वहीँ सज्जन विचार और बोल अमृत के समान हैं।
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“आये है तो जायेंगे, राजा रंक फ़कीर 

इक सिंहासन चढी चले, इक बंधे जंजीर “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि जो इस दुनियां में आया है उसे एक दिन जरूर जाना है। चाहे राजा हो या फ़क़ीर, अंत समय यमदूत सबको एक ही जंजीर में बांध कर ले जायेंगे।
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“ऊँचे कुल का जनमिया, करनी ऊँची न होय 

सुवर्ण कलश सुरा भरा, साधू निंदा होय “

भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि ऊँचे कुल में जन्म तो ले लिया लेकिन अगर कर्म ऊँचे नहीं है तो ये तो वही बात हुई जैसे सोने के लोटे में जहर भरा हो, इसकी चारों ओर निंदा ही होती है।

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“कामी क्रोधी लालची, इनसे भक्ति न होय 

भक्ति करे कोई सुरमा, जाती बरन कुल खोए “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि कामी, क्रोधी और लालची, ऐसे व्यक्तियों से भक्ति नहीं हो पाती। भक्ति तो कोई सूरमा ही कर सकता है जो अपनी जाति, कुल, अहंकार सबका त्याग कर देता है।

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” कागा का को धन हरे, कोयल का को देय 

मीठे वचन सुना के, जग अपना कर लेय “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि कौआ किसी का धन नहीं चुराता लेकिन फिर भी कौआ लोगों को पसंद नहीं होता। वहीँ कोयल किसी को धन नहीं देती लेकिन सबको अच्छी लगती है। ये फर्क है बोली का – कोयल मीठी बोली से सबके मन को हर लेती है।
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“लुट सके तो लुट ले, हरी नाम की लुट 

अंत समय पछतायेगा, जब प्राण जायेगे छुट “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि ये संसार ज्ञान से भरा पड़ा है, हर जगह राम बसे हैं। अभी समय है राम की भक्ति करो, नहीं तो जब अंत समय आएगा तो पछताना पड़ेगा।
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“तिनका कबहुँ ना निंदये, जो पाँव तले होय 

कबहुँ उड़ आँखो पड़े, पीर घानेरी होय “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि तिनके को पाँव के नीचे देखकर उसकी निंदा मत करिये क्यूंकि अगर हवा से उड़के तिनका आँखों में चला गया तो बहुत दर्द करता है। वैसे ही किसी कमजोर या गरीब व्यक्ति की निंदा नहीं करनी चाहिए।
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“माया मरी न मन मरा, मर-मर गए शरीर 

आशा तृष्णा न मरी, कह गए दास कबीर “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि मायाधन और इंसान का मन कभी नहीं मरा, इंसान मरता है शरीर बदलता है लेकिन इंसान की इच्छा और ईर्ष्या कभी नहीं मरती।

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“मांगन मरण समान है, मत मांगो कोई भीख

मांगन से मरना भला, ये सतगुरु की सीख “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि मांगना तो मृत्यु के समान है, कभी किसी से भीख मत मांगो। मांगने से भला तो मरना है।
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“ज्यों नैनन में पुतली, त्यों मालिक घर माँहि

मूरख लोग न जानिए , बाहर ढूँढत जाहिं “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि जैसे आँख के अंदर पुतली है, ठीक वैसे ही ईश्वर हमारे अंदर बसा है। मूर्ख लोग नहीं जानते और बाहर ही ईश्वर को तलाशते रहते हैं।
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“कबीरा जब हम पैदा हुए, जग हँसे हम रोये

ऐसी करनी कर चलो, हम हँसे जग रोये “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि जब हम पैदा हुए थे उस समय सारी दुनिया खुश थी और हम रो रहे थे। जीवन में कुछ ऐसा काम करके जाओ कि जब हम मरें तो दुनियां रोये और हम हँसे।
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“जाति न पूछो साधु की, पूछ लीजिये ज्ञान

मोल करो तरवार का, पड़ा रहन दो म्यान”
भावार्थ:- किसी विद्वान् व्यक्ति से उसकी जाति नहीं पूछनी चाहिए बल्कि ज्ञान की बात करनी चाहिए। असली मोल तो तलवार का होता है म्यान का नहीं।
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“दोस पराए देखि करि, चला हसन्त हसन्त,

अपने याद न आवई, जिनका आदि न अंत “
भावार्थ:- इंसान की फितरत कुछ ऐसी है कि दूसरों के अंदर की बुराइयों को देखकर उनके दोषों पर हँसता है, व्यंग करता है लेकिन अपने दोषों पर कभी नजर नहीं जाती जिसका ना कोई आदि है न अंत।

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“संत ना छाडै संतई, जो कोटिक मिले असंत 

चन्दन भुवंगा बैठिया, तऊ सीतलता न तजंत “
भावार्थ:- सज्जन पुरुष किसी भी परिस्थिति में अपनी सज्जनता नहीं छोड़ते चाहे कितने भी दुष्ट पुरुषों से क्यों ना घिरे हों। ठीक वैसे ही जैसे चन्दन के वृक्ष से हजारों सर्प लिपटे रहते हैं लेकिन वह कभी अपनी शीतलता नहीं छोड़ता।
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“बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय

जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय”
भावार्थ:- जब मैं इस संसार में बुराई खोजने चला तो मुझे कोई बुरा न मिला। जब मैंने अपने मन में झाँक कर देखा तो पाया कि मुझसे बुरा कोई नहीं है।
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“तिनका कबहुँ ना निन्दिये, जो पाँवन तर होय

कबहुँ उड़ी आँखिन पड़े, तो पीर घनेरी होय “
भावार्थ:- कबीर कहते हैं कि एक छोटे से तिनके की भी कभी निंदा न करो जो तुम्हारे पांवों के नीचे दब जाता है। यदि कभी वह तिनका उड़कर आँख में आ गिरे तो कितनी गहरी पीड़ा होती है !

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“धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय

माली सींचे सौ घड़ा, ॠतु आए फल होय”
भावार्थ:- मन में धीरज रखने से सब कुछ होता है। अगर कोई माली किसी पेड़ को सौ घड़े पानी से सींचने लगे तब भी फल तो ऋतु  आने पर ही लगेगा !
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“माला फेरत जुग भया, फिरा न मन का फेर

कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर “
भावार्थ:- कोई व्यक्ति लम्बे समय तक हाथ में लेकर मोती की माला तो घुमाता है, पर उसके मन का भाव नहीं बदलता, उसके मन की हलचल शांत नहीं होती। कबीर की ऐसे व्यक्ति को सलाह है कि हाथ की इस माला को फेरना छोड़ कर मन के मोतियों को बदलो या  फेरो।
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“जिन खोजा तिन पाइया, गहरे पानी पैठ

मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ”
भावार्थ:- जो प्रयत्न करते हैं, वे कुछ न कुछ वैसे ही पा ही लेते  हैं जैसे कोई मेहनत करने वाला गोताखोर गहरे पानी में जाता है और कुछ ले कर आता है। लेकिन कुछ बेचारे लोग ऐसे भी होते हैं जो डूबने के भय से किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं और कुछ नहीं पाते।
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“बोली एक अनमोल है, जो कोई बोलै जानि

हिये तराजू तौलि के, तब मुख बाहर आनि “
भावार्थ:- यदि कोई सही तरीके से बोलना जानता है तो उसे पता है कि वाणी एक अमूल्य रत्न है। इसलिए वह ह्रदय के तराजू में तोलकर ही उसे मुंह से बाहर आने देता है।
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“निंदक नियरे राखिए, ऑंगन कुटी छवाय

बिन पानी, साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय “
भावार्थ:- जो हमारी निंदा करता है, उसे अपने अधिकाधिक पास ही रखना चाहिए। वह तो बिना साबुन और पानी के हमारी कमियां बता कर हमारे स्वभाव को साफ़ करता है।

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“दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार

तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार “
भावार्थ:- इस संसार में मनुष्य का जन्म मुश्किल से मिलता है। यह मानव शरीर उसी तरह बार-बार नहीं मिलता जैसे वृक्ष से पत्ता  झड़ जाए तो दोबारा डाल पर नहीं लगता।
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“कबीरा खड़ा बाज़ार में, मांगे सबकी खैर

ना काहू से दोस्ती,न काहू से बैर “
भावार्थ:- इस संसार में आकर कबीर अपने जीवन में बस यही चाहते हैं कि सबका भला हो और संसार में यदि किसी से दोस्ती नहीं तो दुश्मनी भी न हो
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“हिन्दू कहें मोहि राम पियारा, तुर्क कहें रहमाना

आपस में दोउ लड़ी-लड़ी  मुए, मरम न कोउ जाना “
भावार्थ:- कबीर कहते हैं कि हिन्दू राम के भक्त हैं और तुर्क मुस्लिम को रहमान प्यारा है। इसी बात पर दोनों लड़-लड़ कर मौत के मुंह में जा पहुंचे, तब भी दोनों में से कोई सच को न जान पाया।
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“कहत सुनत सब दिन गए, उरझि न सुरझ्या मन

कही कबीर चेत्या नहीं, अजहूँ सो पहला दिन “
भावार्थ:- कहते सुनते सब दिन निकल गए, पर यह मन उलझ कर न सुलझ पाया। कबीर कहते हैं कि अब भी यह मन होश में नहीं आता। आज भी इसकी अवस्था पहले दिन के समान ही है।
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“कबीर लहरि समंद की, मोती बिखरे आई

बगुला भेद न जानई, हंसा चुनी-चुनी खाई “
भावार्थ:-कबीर कहते हैं कि समुद्र की लहर में मोती आकर बिखर गए। बगुला उनका भेद नहीं जानता, परन्तु हंस उन्हें चुन-चुन कर खा रहा है। इसका भावार्थ यह है कि किसी भी वस्तु का महत्व जानकार ही जानता है।

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“जब गुण को गाहक मिले, तब गुण लाख बिकाई

जब गुण को गाहक नहीं, तब कौड़ी बदले जाई “
भावार्थ:- कबीर कहते हैं कि जब गुण को परखने वाला गाहक मिल जाता है तो  गुण की कीमत होती है। पर जब ऐसा गाहक नहीं मिलता, तब गुण कौड़ी के भाव चला जाता है।
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“कबीर कहा गरबियो, काल गहे कर केस

ना जाने कहाँ मारिसी, कै घर कै परदेस “
भावार्थ:- कबीर कहते हैं कि हे मानव ! तू क्या गर्व करता है? काल अपने हाथों में तेरे केश पकड़े हुए है। मालूम नहीं, वह घर या परदेश में, कहाँ पर तुझे मार डाले।
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“हाड़ जलै ज्यूं लाकड़ी, केस जलै ज्यूं घास

सब तन जलता देखि करि, भया कबीर उदास “
भावार्थ:- यह नश्वर मानव देह अंत समय में लकड़ी की तरह जलती है और केश घास की तरह जल उठते हैं। सम्पूर्ण शरीर को इस तरह जलता देख, इस अंत पर कबीर का मन उदासी से भर जाता है।


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“जो उग्या सो अन्तबै, फूल्या सो कुमलाहीं

जो चिनिया सो ढही पड़े, जो आया सो जाहीं “
भावार्थ:- इस संसार का नियम यही है कि जो उदय हुआ है,वह अस्त होगा। जो विकसित हुआ है वह मुरझा जाएगा। जो चिना गया है वह गिर पड़ेगा और जो आया है वह जाएगा।

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“झूठे सुख को सुख कहे, मानत है मन मोद

खलक चबैना काल का, कुछ मुंह में कुछ गोद “
भावार्थ:- कबीर कहते हैं कि अरे जीव ! तू झूठे सुख को सुख कहता है और मन में प्रसन्न होता है? देख यह सारा संसार मृत्यु के लिए उस भोजन के समान है, जो कुछ तो उसके मुंह में है और कुछ गोद में खाने के लिए रखा है।
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“ऐसा कोई ना मिले, हमको दे उपदेस 

भौ सागर में डूबता, कर गहि काढै केस “
भावार्थ:- कबीर संसारी जनों के लिए दुखित होते हुए कहते हैं कि इन्हें कोई ऐसा पथप्रदर्शक न  मिला जो उपदेश देता और संसार सागर में डूबते हुए इन प्राणियों को अपने हाथों से केश पकड़ कर निकाल लेता।
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“कबीर तन पंछी भया, जहां मन तहां उडी जाइ

जो जैसी संगती कर, सो तैसा ही फल पाइ “
भावार्थ:- कबीर कहते हैं कि संसारी व्यक्ति का शरीर पक्षी बन गया है और जहां उसका मन होता है, शरीर उड़कर वहीं पहुँच जाता है। सच है कि जो जैसा साथ करता है, वह वैसा ही फल पाता है।
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“कबीर सो धन संचे, जो आगे को होय

सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्यो कोय “
भावार्थ:- कबीर कहते हैं कि उस धन को इकट्ठा करो जो भविष्य में काम आए। सर पर धन की गठरी बाँध कर ले जाते तो किसी को नहीं देखा।
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“माया मुई न मन मुआ, मरी मरी गया सरीर

आसा त्रिसना न मुई, यों कही गए कबीर  “
भावार्थ:- कबीर कहते हैं कि संसार में रहते हुए न माया मरती है न मन। शरीर न जाने कितनी बार मर चुका पर मनुष्य की आशा और तृष्णा कभी नहीं मरती, कबीर ऐसा कई बार कह चुके हैं।

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” मन हीं मनोरथ छांड़ी दे, तेरा किया न होई

पानी में घिव निकसे, तो रूखा खाए न कोई  “
भावार्थ:- मनुष्य मात्र को समझाते हुए कबीर कहते हैं कि मन की इच्छाएं छोड़ दो , उन्हें तुम अपने बूते पर पूर्ण नहीं कर सकते। यदि पानी से घी निकल आए, तो रूखी रोटी कोई न खाएगा।
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“जब मैं था तब हरी नहीं, अब हरी है मैं नाही 

सब अँधियारा मिट गया, दीपक देखा माही “
भावार्थ:- जब मैं अपने अहंकार में डूबा था – तब प्रभु को न देख पाता था – लेकिन जब गुरु ने ज्ञान का दीपक मेरे भीतर प्रकाशित किया तब अज्ञान का सब अन्धकार मिट गया  – ज्ञान की ज्योति से अहंकार जाता रहा और ज्ञान के आलोक में प्रभु को पाया।
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“कबीर सुता क्या करे, जागी न जपे मुरारी 

एक दिन तू भी सोवेगा, लम्बे पाँव पसारी “
भावार्थ:- कबीर कहते हैं – अज्ञान की नींद में सोए क्यों रहते हो? ज्ञान की जागृति को हासिल कर प्रभु का नाम लो।सजग होकर प्रभु का ध्यान करो।वह दिन दूर नहीं जब तुम्हें गहन निद्रा में सो ही जाना है – जब तक जाग सकते हो जागते क्यों नहीं? प्रभु का नाम स्मरण क्यों नहीं करते ?
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“आछे-पाछे दिन पाछे गए, हरी से किया न हेत 

अब पछताए होत क्या, चिडिया चुग गई खेत “
भावार्थ:- देखते ही देखते सब भले दिन – अच्छा समय बीतता चला गया – तुमने प्रभु से लौ नहीं लगाई – प्यार नहीं किया समय बीत जाने पर पछताने से क्या मिलेगा? पहले जागरूक न थे – ठीक उसी तरह जैसे कोई किसान अपने खेत की रखवाली ही न करे और देखते ही देखते पंछी उसकी फसल बर्बाद कर जाएं।
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“रात गंवाई सोय के, दिवस गंवाया खाय 

हीरा जन्म अमोल सा, कोड़ी बदले जाय “
भावार्थ:- रात नींद में नष्ट कर दी – सोते रहे – दिन में भोजन से फुर्सत नहीं मिली यह मनुष्य जन्म हीरे के सामान बहुमूल्य था जिसे तुमने व्यर्थ कर दिया – कुछ सार्थक किया नहीं तो जीवन का क्या मूल्य बचा ? एक कौड़ी –

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“बड़ा हुआ तो क्या हुआ, जैसे पेड़ खजूर

पंछी को छाया नहीं फल लागे अति दूर “
भावार्थ:- खजूर के पेड़ के समान बड़ा होने का क्या लाभ, जो ना ठीक से किसी को छाँव दे पाता है और न ही उसके फल सुलभ होते हैं।
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“हरिया जांणे रूखड़ा, उस पाणी का नेह

सूका काठ न जानई, कबहूँ बरसा मेंह ” 
भावार्थ:-पानी के स्नेह को हरा वृक्ष ही जानता है।सूखा काठ – लकड़ी क्या जाने कि कब पानी बरसा? भावार्थात सहृदय ही प्रेम भाव को समझता है।निर्मम मन इस भावना को क्या जाने ?.
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“झिरमिर- झिरमिर बरसिया, पाहन ऊपर मेंह

माटी गलि सैजल भई, पांहन बोही तेह “
भावार्थ:-बादल पत्थर के ऊपर झिरमिर करके बरसने लगे। इससे मिट्टी तो भीग कर सजल हो गई किन्तु पत्थर वैसा का वैसा बना रहा।
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“कबीर थोड़ा जीवना, मांड़े बहुत मंड़ाण

कबीर थोड़ा जीवना, मांड़े बहुत मंड़ाण “
भावार्थ:-बादल पत्थर के ऊपर झिरमिर करके बरसने लगे। इससे मिट्टी तो भीग कर सजल हो गई किन्तु पत्थर वैसा का वैसा बना रहा।
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“इक दिन ऐसा होइगा, सब सूं पड़े बिछोह
राजा राणा छत्रपति, सावधान किन होय “
भावार्थ:- एक दिन ऐसा जरूर आएगा जब सबसे बिछुड़ना पडेगा। हे राजाओं ! हे छत्रपतियों ! तुम अभी से सावधान क्यों नहीं हो जाते !
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“कबीर प्रेम न चक्खिया,चक्खि न लिया साव

सूने घर का पाहुना, ज्यूं आया त्यूं जाव “
भावार्थ:- कबीर कहते हैं कि जिस व्यक्ति ने प्रेम को चखा नहीं, और चख कर स्वाद नहीं लिया, वह उसअतिथि के समान है जो सूने, निर्जन घर में जैसा आता है, वैसा ही चला भी जाता है, कुछ प्राप्त नहीं कर पाता।
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“मान, महातम, प्रेम रस, गरवा तण गुण नेह

ए सबही अहला गया, जबहीं कह्या कुछ देह”
भावार्थ:-मान, महत्त्व, प्रेम रस, गौरव गुण तथा स्नेह – सब बाढ़ में बह जाते हैं जब किसी मनुष्य से कुछ देने के लिए कहा जाता है।

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“जाता है सो जाण दे, तेरी दसा न जाइ

खेवटिया की नांव ज्यूं, घने मिलेंगे आइ “
भावार्थ:-जो जाता है उसे जाने दो। तुम अपनी स्थिति को, दशा को न जाने दो। यदि तुम अपने स्वरूप में बने रहे तो केवट की नाव की तरह अनेक व्यक्ति आकर तुमसे मिलेंगे।
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दुर्लभ मानुष जन्म है, देह न बारम्बार,

तरुवर ज्यों पत्ता झड़े, बहुरि न लागे डार “

भावार्थ:- मानव जन्म पाना कठिन है। यह शरीर बार-बार नहीं मिलता। जो फल वृक्ष से नीचे गिर पड़ता है वह पुन: उसकी डाल पर नहीं लगता ।
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“यह तन काचा कुम्भ है,लिया फिरे था साथ

ढबका लागा फूटिगा, कछू न आया हाथ “
भावार्थ:- यह शरीर कच्चा घड़ा है जिसे तू साथ लिए घूमता फिरता था।जरा-सी चोट लगते ही यह फूट गया। कुछ भी हाथ नहीं आया।
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“मैं मैं बड़ी बलाय है, सकै तो निकसी भागि

कब लग राखौं हे सखी, रूई लपेटी आगि “
भावार्थ:- अहंकार बहुत बुरी वस्तु है। हो सके तो इससे निकल कर भाग जाओ। मित्र, रूई में लिपटी इस अग्नि – अहंकार – को मैं कब तक अपने पास रखूँ?
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“कबीर बादल प्रेम का, हम पर बरसा आई 

अंतरि भीगी आतमा, हरी भई बनराई  “
भावार्थ:- कबीर कहते हैं – प्रेम का बादल मेरे ऊपर आकर बरस पडा  – जिससे अंतरात्मा  तक भीग गई, आस पास पूरा परिवेश हरा-भरा हो गया – खुश हाल हो गया ,यह प्रेम का अपूर्व प्रभाव है | हम इसी प्रेम में क्यों नहीं जीते
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“जिहि घट प्रेम न प्रीति रस, पुनि रसना नहीं नाम

ते नर या संसार में , उपजी भए बेकाम  “
भावार्थ:- जिनके ह्रदय में न तो प्रीति है और न प्रेम का स्वाद, जिनकी जिह्वा पर राम का नाम नहीं रहता – वे मनुष्य इस संसार में उत्पन्न हो कर भी व्यर्थ हैं। प्रेम जीवन की सार्थकता है। प्रेम रस में डूबे रहना जीवन का सार है।

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“लंबा मारग दूरि घर, बिकट पंथ बहु मार

कहौ संतों क्यूं पाइए, दुर्लभ हरि दीदार “
भावार्थ:- घर दूर है मार्ग लंबा है रास्ता भयंकर है और उसमें अनेक पातक चोर ठग हैं। हे सज्जनों ! कहो , भगवान् का दुर्लभ दर्शन कैसे प्राप्त हो?संसार में जीवन कठिन  है – अनेक बाधाएं हैं विपत्तियां हैं – उनमें पड़कर हम भरमाए रहते हैं – बहुत से आकर्षण हमें अपनी ओर खींचते रहते हैं – हम अपना लक्ष्य भूलते रहते हैं – अपनी पूंजी गंवाते रहते हैं।
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“इस तन का दीवा करों, बाती मेल्यूं जीव

लोही सींचौं तेल ज्यूं, कब मुख देखों पीव “
भावार्थ:- इस शरीर को दीपक बना लूं, उसमें प्राणों की बत्ती डालूँ और रक्त से तेल की तरह सींचूं – इस तरह दीपक जला कर मैं अपने प्रिय के मुख का दर्शन कब कर पाऊंगा? ईश्वर  से लौ लगाना उसे पाने की चाह करना उसकी भक्ति में तन-मन  को लगाना एक साधना है तपस्या है – जिसे कोई कोई विरला ही कर पाता है !
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“नैना अंतर आव तू, ज्यूं हौं नैन झंपेउ

ना हौं देखूं और को न तुझ देखन देऊँ “
भावार्थ:- हे प्रिय !  प्रभु  तुम इन दो नेत्रों की राह से मेरे भीतर आ जाओ और फिर मैं अपने इन नेत्रों को बंद कर लूं ! फिर न तो मैं किसी दूसरे  को देखूं और न ही किसी और को तुम्हें देखने दूं !
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“कबीर रेख सिन्दूर की काजल दिया न जाई

नैनूं रमैया रमि रहा  दूजा कहाँ समाई  “
भावार्थ:- कबीर  कहते हैं कि जहां सिन्दूर की रेखा है – वहां काजल नहीं दिया जा सकता। जब नेत्रों में राम विराज रहे हैं तो वहां कोई अन्य कैसे निवास कर सकता है ?
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“कबीर सीप समंद की, रटे पियास पियास 

समुदहि तिनका करि गिने, स्वाति बूँद की आस  “
भावार्थ:- कबीर कहते हैं कि समुद्र की सीपी प्यास प्यास रटती रहती है।  स्वाति नक्षत्र की बूँद की आशा लिए हुए समुद्र की अपार जलराशि को तिनके के बराबर समझती है। हमारे मन में जो पाने की ललक है जिसे पाने की लगन है, उसके बिना सब निस्सार है।

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“सातों सबद जू बाजते घरि घरि होते राग 

ते मंदिर खाली परे बैसन लागे काग “
भावार्थ:- कबीर कहते हैं कि जिन घरों में सप्त स्वर गूंजते थे, पल पल उत्सव मनाए जाते थे, वे घर भी अब खाली पड़े हैं – उनपर कौए बैठने लगे हैं। हमेशा एक सा समय तो नहीं रहता ! जहां खुशियाँ थी वहां गम छा जाता है जहां हर्ष था वहां विषाद डेरा डाल सकता है – यह  इस संसार में होता है !।
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“कबीर कहा गरबियौ, ऊंचे देखि अवास 

काल्हि परयौ भू लेटना ऊपरि जामे घास “
भावार्थ:- कबीर कहते है कि ऊंचे भवनों को देख कर क्या गर्व करते हो ? कल या परसों ये ऊंचाइयां और आप भी धरती पर लेट जाएंगे ध्वस्त हो जाएंगे और ऊपर से घास उगने लगेगी ! वीरान सुनसान हो जाएगा जो अभी हंसता खिलखिलाता घर आँगन है ! इसलिए कभी गर्व न करना चाहिए
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“जांमण मरण बिचारि करि कूड़े काम निबारि 

जिनि पंथूं तुझ चालणा सोई पंथ संवारि  “
भावार्थ:- जन्म और मरण का विचार करके , बुरे कर्मों को छोड़ दे। जिस मार्ग पर तुझे चलना है उसी मार्ग का स्मरण  कर – उसे ही याद रख – उसे ही संवार सुन्दर बना।
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“बिन रखवाले बाहिरा, चिड़िये खाया खेत 

आधा परधा ऊबरै, चेती सकै तो चेत “
भावार्थ:- रखवाले के बिना बाहर से चिड़ियों ने खेत खा लिया। कुछ खेत अब भी बचा है – यदि सावधान हो सकते हो तो हो जाओ – उसे बचा लो ! जीवन में  असावधानी के कारण  इंसान बहुत कुछ गँवा देता है – उसे खबर भी नहीं लगती – नुक्सान हो चुका होता है – यदि हम सावधानी बरतें तो कितने नुक्सान से बच सकते हैं !  इसलिए जागरूक होना है हर इंसान को – जैसे पराली जलाने की सावधानी बरतते तो दिल्ली में भयंकर वायु प्रदूषण से बचते पर – अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत !
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“कबीर देवल ढहि पड्या ईंट भई सेंवार 

करी चिजारा सौं प्रीतड़ी ज्यूं ढहे न दूजी बार “
भावार्थ:- कबीर कहते हैं शरीर रूपी देवालय नष्ट हो गया – उसकी ईंट ईंट – अर्थात शरीर का अंग अंग – शैवाल अर्थात काई में बदल गई। इस देवालय को बनाने वाले प्रभु से प्रेम कर जिससे यह देवालय दूसरी बार नष्ट न हो।

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“कबीर मंदिर लाख का, जडियां हीरे लालि 

दिवस चारि का पेषणा, बिनस जाएगा कालि “
भावार्थ:- यह शरीर लाख का बना मंदिर है जिसमें हीरे और लाल जड़े हुए हैं।यह चार दिन का खिलौना है कल ही नष्ट हो जाएगा। शरीर नश्वर है–जतन करके मेहनत  करके उसे सजाते हैं तब उसकी क्षण भंगुरता को भूल जाते हैं किन्तु सत्य तो इतना ही है कि देह किसी कच्चे खिलौने की तरह टूट फूट जाती है–अचानक ऐसे कि हम जान भी नहीं पाते
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“कबीर यह तनु जात है सकै तो लेहू बहोरि 
नंगे हाथूं ते गए जिनके लाख करोडि “
भावार्थ:- यह शरीर नष्ट होने वाला है हो सके तो अब भी संभल जाओ – इसे संभाल लो !  जिनके पास लाखों करोड़ों की संपत्ति थी वे भी यहाँ से खाली हाथ ही गए हैं – इसलिए जीते जी धन संपत्ति जोड़ने में ही न लगे रहो – कुछ सार्थक भी कर लो ! जीवन को कोई दिशा दे लो – कुछ भले काम कर लो !
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“हू तन तो सब बन भया करम भए कुहांडि 

आप आप कूँ काटि है, कहै कबीर बिचारि “
भावार्थ:- यह शरीर तो सब जंगल के समान है – हमारे कर्म ही कुल्हाड़ी के समान हैं। इस प्रकार हम खुद अपने आपको काट रहे हैं – यह बात कबीर सोच विचार कर कहते हैं।
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“तेरा संगी कोई नहीं सब स्वारथ बंधी लोइ 

मन परतीति न उपजै, जीव बेसास न होइ “
भावार्थ:- तेरा साथी कोई भी नहीं है। सब मनुष्य स्वार्थ में बंधे हुए हैं, जब तक इस बात की प्रतीति – भरोसा – मन में उत्पन्न नहीं होता तब तक आत्मा के प्रति विशवास जाग्रत नहीं होता। भावार्थात वास्तविकता का ज्ञान न होने से मनुष्य संसार में रमा रहता है जब संसार के सच को जान लेता है – इस स्वार्थमय सृष्टि को समझ लेता है – तब ही अंतरात्मा की ओर उन्मुख होता है – भीतर झांकता है !
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“मैं मैं मेरी जिनी करै, मेरी सूल बिनास 

मेरी पग का पैषणा मेरी  गल की पास  “
भावार्थ:- ममता और अहंकार में मत फंसो और बंधो – यह मेरा है कि रट मत लगाओ – ये विनाश के मूल हैं – जड़ हैं – कारण हैं – ममता पैरों की बेडी है और गले की फांसी है।

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“कबीर नाव जर्जरी कूड़े खेवनहार 

हलके हलके तिरि गए बूड़े तिनि सर भार  “
भावार्थ:- कबीर कहते हैं कि जीवन की नौका टूटी फूटी है जर्जर है उसे खेने वाले मूर्ख हैं  जिनके सर पर  विषय वासनाओं  का बोझ है वे तो संसार सागर में डूब जाते हैं – संसारी हो कर रह जाते हैं दुनिया के धंधों से उबर नहीं पाते – उसी में उलझ कर रह जाते हैं पर जो इनसे मुक्त हैं – हलके हैं वे तर जाते हैं पार लग जाते हैं भव सागर में डूबने से बच जाते हैं।
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“मन जाणे सब बात जांणत ही औगुन करै 

काहे की कुसलात कर दीपक कूंवै पड़े  “
भावार्थ:- मन सब बातों को जानता है जानता हुआ भी अवगुणों में फंस जाता है जो दीपक हाथ में पकडे हुए भी कुंए में गिर पड़े उसकी कुशल कैसी?
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“हिरदा भीतर आरसी मुख देखा नहीं जाई 

मुख तो तौ परि देखिए जे मन की दुविधा जाई “
भावार्थ:- ह्रदय के अंदर ही दर्पण है परन्तु – वासनाओं की मलिनता के कारण – मुख का स्वरूप दिखाई ही नहीं देता मुख या अपना चेहरा या वास्तविक स्वरूप तो तभी दिखाई पड सकता  जब मन का संशय मिट जाए !
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“करता था तो क्यूं रहया, जब करि क्यूं पछिताय 

बोये पेड़ बबूल का, अम्ब कहाँ ते खाय “
भावार्थ:- यदि तू अपने को कर्ता समझता था तो चुप क्यों बैठा रहा? और अब कर्म करके पश्चात्ताप  क्यों करता है? पेड़ तो बबूल का लगाया है – फिर आम खाने को कहाँ से मिलें ?
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“मनहिं मनोरथ छांडी दे, तेरा किया न होइ 

पाणी मैं घीव नीकसै, तो रूखा खाई न कोइ  “
भावार्थ:- मन की इच्छा छोड़ दो।उन्हें तुम अपने बल पर पूरा नहीं कर सकते। यदि जल से घी निकल आवे, तो रूखी रोटी कोई भी न खाएगा!


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“माया मुई न मन मुवा, मरि मरि गया सरीर 

आसा त्रिष्णा णा मुई यों कहि गया कबीर “
भावार्थ:- न माया मरती है न मन शरीर न जाने कितनी बार मर चुका। आशा, तृष्णा कभी नहीं मरती – ऐसा कबीर कई बार कह चुके हैं।

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“कबीर सो धन संचिए जो आगे कूं होइ

सीस चढ़ाए पोटली, ले जात न देख्या कोइ “
भावार्थ:- कबीर कहते हैं कि उस धन को इकट्ठा करो जो भविष्य में काम दे। सर पर धन की गठरी बांधकर ले जाते तो किसी को नहीं देखा।
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“झूठे को झूठा मिले, दूंणा बंधे सनेह

झूठे को साँचा मिले तब ही टूटे नेह “
भावार्थ:- जब झूठे आदमी को दूसरा झूठा आदमी मिलता है तो दूना प्रेम बढ़ता है। पर जब झूठे को एक सच्चा आदमी मिलता है तभी प्रेम टूट जाता है।
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“करता केरे गुन बहुत औगुन कोई नाहिं

जे दिल खोजों आपना, सब औगुन मुझ माहिं “
भावार्थ:- प्रभु में गुण बहुत हैं – अवगुण कोई नहीं है।जब हम अपने ह्रदय की खोज करते हैं तब समस्त अवगुण अपने ही भीतर पाते हैं।
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“कबीर चन्दन के निडै नींव भी चन्दन होइ

बूडा बंस बड़ाइता यों जिनी बूड़े कोइ”
भावार्थ:- कबीर कहते हैं कि यदि चंदन के वृक्ष के पास नीम  का वृक्ष हो तो वह भी कुछ सुवास ले लेता है – चंदन का कुछ प्रभाव पा लेता है । लेकिन बांस अपनी लम्बाई – बडेपन – बड़प्पन के कारण डूब जाता है। इस तरह तो किसी को भी नहीं डूबना चाहिए। संगति का अच्छा प्रभाव ग्रहण करना चाहिए – आपने गर्व में ही न रहना चाहिए ।
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“क्काज्ल केरी कोठारी, मसि के कर्म कपाट

पांहनि बोई पृथमीं,पंडित पाड़ी बात “
भावार्थ:- यह संसार काजल की कोठरी है, इसके कर्म रूपी कपाट कालिमा के ही बने हुए हैं। पंडितों ने पृथ्वीपर पत्थर की मूर्तियाँ स्थापित करके मार्ग का निर्माण किया है।
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“मूरख संग न कीजिए ,लोहा जल न तिराई

कदली सीप भावनग मुख, एक बूँद तिहूँ भाई “
भावार्थ:- मूर्ख का साथ मत करो।मूर्ख लोहे के सामान है जो जल में तैर नहीं पाता  डूब जाता है । संगति का प्रभाव इतना पड़ता है कि आकाश से एक बूँद केले के पत्ते पर गिर कर कपूर, सीप के अन्दर गिर कर मोती और सांप के मुख में पड़कर विष बन जाती है।
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“ऊंचे कुल क्या जनमिया जे करनी ऊंच न होय

सुबरन कलस सुरा भरा साधू निन्दै सोय “
भावार्थ:- यदि कार्य उच्च कोटि के नहीं हैं तो उच्च कुल में जन्म लेने से क्या लाभ? सोने का कलश यदि सुरा से भरा है तो साधु उसकी निंदा ही करेंगे।

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“कबीर संगति साध की , कड़े न निर्फल होई 

चन्दन होसी बावना , नीब न कहसी कोई  “
भावार्थ:- कबीर कहते हैं कि साधु  की संगति कभी निष्फल नहीं होती। चन्दन का वृक्ष यदि छोटा – वामन – बौना  भी होगा तो भी उसे कोई नीम का वृक्ष नहीं कहेगा। वह सुवासित ही रहेगा  और अपने परिवेश को सुगंध ही देगा। आपने आस-पास को खुशबू से ही भरेगा
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“जानि बूझि साँचहि तजै, करै झूठ सूं नेह 

ताकी संगति रामजी, सुपिनै ही जिनि देहु  “
भावार्थ:- जो जानबूझ कर सत्य का साथ छोड़ देते हैं झूठ से प्रेम करते हैं हे भगवान् ऐसे लोगों की संगति हमें स्वप्न में भी न देना।
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“मन मरया ममता मुई, जहं गई सब छूटी

जोगी था सो रमि गया, आसणि रही बिभूति “
भावार्थ:- मन को मार डाला ममता भी समाप्त हो गई अहंकार सब नष्ट हो गया जो योगी था वह तो यहाँ से चला गया अब आसन पर उसकी भस्म – विभूति पड़ी रह गई अर्थात संसार में केवल उसका यश रह गया
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“तरवर तास बिलम्बिए, बारह मांस फलंत 

सीतल छाया गहर फल, पंछी केलि करंत “
भावार्थ:- कबीर कहते हैं कि ऐसे वृक्ष के नीचे विश्राम करो, जो बारहों महीने फल देता हो ।जिसकी छाया शीतल हो , फल सघन हों और जहां पक्षी क्रीडा करते हों !
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“काची काया मन अथिर थिर थिर  काम करंत 

ज्यूं-ज्यूं नर  निधड़क फिरै त्यूं त्यूं काल हसन्त “
भावार्थ:- शरीर कच्चा अर्थात नश्वर है मन चंचल है परन्तु तुम इन्हें स्थिर मान कर काम  करते हो – इन्हें अनश्वर मानते हो मनुष्य जितना इस संसार में रमकर निडर घूमता है – मगन रहता है – उतना ही काल अर्थात मृत्यु उस पर  हँसता है ! मृत्यु पास है यह जानकर भी इंसान अनजान बना रहता है ! कितनी दुखभरी बात है।
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“जल में कुम्भ कुम्भ  में जल है बाहर भीतर पानी 

फूटा कुम्भ जल जलहि समाना यह तथ कह्यौ गयानी “
भावार्थ:- जब पानी भरने जाएं तो घडा जल में रहता है और भरने पर जल घड़े के अन्दर आ जाता है इस तरह देखें तो – बाहर और भीतर पानी ही रहता है – पानी की ही सत्ता है। जब घडा फूट जाए तो उसका जल जल में ही मिल जाता है – अलगाव नहीं रहता – ज्ञानी जन इस तथ्य को कह गए हैं !  आत्मा-परमात्मा दो नहीं एक हैं – आत्मा परमात्मा में और परमात्मा आत्मा में विराजमान है। अंतत: परमात्मा की ही सत्ता है –  जब देह विलीन होती है – वह परमात्मा का ही अंश हो जाती है – उसी में समा जाती है। एकाकार हो जाती है।

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“तू कहता कागद की लेखी मैं कहता आँखिन की देखी 

मैं कहता सुरझावन हारि, तू राख्यौ उरझाई रे “
भावार्थ:- तुम कागज़ पर लिखी बात को सत्य  कहते हो – तुम्हारे लिए वह सत्य है जो कागज़ पर लिखा है। किन्तु मैं आंखों देखा सच ही कहता और लिखता हूँ। कबीर पढे-लिखे नहीं थे पर उनकी बातों में सचाई थी। मैं सरलता से हर बात को सुलझाना चाहता हूँ – तुम उसे उलझा कर क्यों रख देते हो? जितने सरल बनोगे – उलझन से उतने ही दूर हो पाओगे।
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“मन के हारे हार है मन के जीते जीत 

कहे कबीर हरि पाइए मन ही की परतीत  “
भावार्थ:- जीवन में जय पराजय केवल मन की भावनाएं हैं।यदि मनुष्य मन में हार गया – निराश हो गया तो  पराजय है और यदि उसने मन को जीत लिया तो वह विजेता है। ईश्वर को भी मन के विश्वास से ही पा सकते हैं – यदि प्राप्ति का भरोसा ही नहीं तो कैसे पाएंगे?
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“जब मैं था तब हरि नहीं अब हरि है मैं नाहीं 

प्रेम गली अति सांकरी जामें दो न समाहीं “
भावार्थ:- जब तक मन में अहंकार था तब तक ईश्वर का साक्षात्कार न हुआ। जब अहम समाप्त हुआ तभी प्रभु  मिले। जब ईश्वर का साक्षात्कार हुआ – तब अहम स्वत: नष्ट हो गया। ईश्वर की सत्ता का बोध तभी हुआ जब अहंकार गया। प्रेम में द्वैत भाव नहीं हो सकता – प्रेम की संकरी – पतली गली में एक ही समा सकता है – अहम् या परम ! परम की प्राप्ति के लिए अहम् का विसर्जन आवश्यक है।
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“पढ़ी पढ़ी के पत्थर भया लिख लिख भया जू ईंट 

कहें कबीरा प्रेम की लगी न एको छींट “
भावार्थ:- ज्ञान से बड़ा प्रेम है – बहुत ज्ञान हासिल करके यदि मनुष्य पत्थर सा कठोर हो जाए, ईंट जैसा निर्जीव हो जाए – तो क्या पाया? यदि ज्ञान मनुष्य को रूखा और कठोर बनाता है तो ऐसे ज्ञान का कोई लाभ नहीं। जिस मानव मन को प्रेम  ने नहीं छुआ, वह प्रेम के अभाव में जड़ हो रहेगा। प्रेम की एक बूँद – एक छींटा भर जड़ता को मिटाकर मनुष्य को सजीव बना देता है।
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“जाति न पूछो साधू की पूछ लीजिए ज्ञान 

मोल करो तरवार को पडा रहन दो म्यान “
भावार्थ:- सच्चा साधु सब प्रकार के भेदभावों से ऊपर उठ जाता है। उससे यह न पूछो की वह किस जाति का है साधु कितना ज्ञानी है यह जानना महत्वपूर्ण है। साधु की जाति म्यान के समान है और उसका ज्ञान तलवार की धार के समान है। तलवार की धार ही उसका मूल्य है – उसकी म्यान तलवार के मूल्य को नहीं बढाती।
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“साधु भूखा भाव का धन का भूखा नाहीं 

धन का भूखा जो फिरै सो तो साधु नाहीं “
भावार्थ:- साधु का मन भाव को जानता है, भाव का भूखा होता है,  वह धन का लोभी नहीं होता जो धन का लोभी है वह तो साधु नहीं हो सकता !

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“पढ़े गुनै सीखै सुनै मिटी न संसै सूल

कहै कबीर कासों कहूं ये ही दुःख का मूल “
भावार्थ:- बहुत सी पुस्तकों को पढ़ा गुना सुना सीखा  पर फिर भी मन में गड़ा संशय का काँटा न निकला कबीर कहते हैं कि किसे समझा कर यह कहूं कि यही तो सब दुखों की जड़ है – ऐसे पठन मनन से क्या लाभ जो मन का संशय न मिटा सके?
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“प्रेम न बाडी उपजे प्रेम न हाट बिकाई 

राजा परजा जेहि रुचे सीस देहि ले जाई “
भावार्थ:- प्रेम खेत में नहीं उपजता प्रेम बाज़ार में नहीं बिकता चाहे कोई राजा हो या साधारण प्रजा – यदि प्यार पाना चाहते हैं तो वह आत्म बलिदान से ही मिलेगा। त्याग और बलिदान के बिना प्रेम को नहीं पाया जा सकता। प्रेम गहन- सघन भावना है – खरीदी बेचे जाने वाली वस्तु नहीं !
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“कबीर सोई पीर है जो जाने पर पीर 

जो पर पीर न जानई  सो काफिर बेपीर “
भावार्थ:- कबीर  कहते हैं कि सच्चा पीर – संत वही है जो दूसरे की पीड़ा को जानता है जो दूसरे के दुःख को नहीं जानते वे बेदर्द हैं – निष्ठुर हैं और काफिर हैं।
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“हाड जले लकड़ी जले जले जलावन हार 

कौतिकहारा भी  जले कासों करूं पुकार “
भावार्थ:- दाह क्रिया में हड्डियां जलती हैं उन्हें जलाने वाली लकड़ी जलती है उनमें आग लगाने वाला भी एक दिन जल जाता है। समय आने पर उस दृश्य को देखने वाला दर्शक भी जल जाता है। जब सब का अंत यही हो तो पनी पुकार किसको दू? किससे  गुहार करूं – विनती या कोई आग्रह करूं? सभी तो एक नियति से बंधे हैं ! सभी का अंत एक है
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“रात गंवाई सोय कर दिवस गंवायो खाय 

हीरा जनम अमोल था कौड़ी बदले जाय “
भावार्थ:- रात सो कर बिता दी,  दिन खाकर बिता दिया हीरे के समान कीमती जीवन को संसार के निर्मूल्य विषयों की – कामनाओं और वासनाओं की भेंट चढ़ा दिया – इससे दुखद क्या हो सकता है ?
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“मन मैला तन ऊजला बगुला कपटी अंग 

तासों तो कौआ भला तन मन एकही रंग “
भावार्थ:- बगुले का शरीर तो उज्जवल है पर मन काला – कपट से भरा है – उससे  तो कौआ भला है जिसका तन मन एक जैसा है और वह किसी को छलता भी नहीं है।

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“कबीर हमारा कोई नहीं हम काहू के नाहिं 

पारै पहुंचे नाव ज्यौं मिलिके बिछुरी जाहिं “
भावार्थ:- इस जगत में न कोई हमारा अपना है और न ही हम किसी के ! जैसे नांव के नदी पार पहुँचने पर उसमें मिलकर बैठे हुए सब यात्री बिछुड़ जाते हैं वैसे ही हम सब मिलकर बिछुड़ने वाले हैं। सब सांसारिक सम्बन्ध यहीं छूट जाने वाले हैं
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“देह धरे का दंड है सब काहू को होय 

ज्ञानी भुगते ज्ञान से अज्ञानी भुगते रोय “
भावार्थ:- देह धारण करने का दंड – भोग या प्रारब्ध निश्चित है जो सब को भुगतना होता है। अंतर इतना ही है कि ज्ञानी या समझदार व्यक्ति इस भोग को या दुःख को समझदारी से भोगता है निभाता है संतुष्ट रहता है जबकि अज्ञानी रोते हुए – दुखी मन से सब कुछ झेलता है !
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“हीरा परखै जौहरी शब्दहि परखै साध 

कबीर परखै साध को ताका मता अगाध “
भावार्थ:- हीरे की परख जौहरी जानता है – शब्द के सार– असार को परखने वाला विवेकी साधु – सज्जन होता है । कबीर कहते हैं कि जो साधु–असाधु को परख लेता है उसका मत – अधिक गहन गंभीर है !
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“एकही बार परखिये ना वा बारम्बार 

बालू तो हू किरकिरी जो छानै सौ बार “
भावार्थ:- किसी व्यक्ति को बस ठीक ठीक एक बार ही परख लो तो उसे बार बार परखने की आवश्यकता न होगी। रेत को अगर सौ बार भी छाना जाए तो भी उसकी किरकिराहट दूर न होगी – इसी प्रकार मूढ़ दुर्जन को बार बार भी परखो तब भी वह अपनी मूढ़ता दुष्टता से भरा वैसा ही मिलेगा। किन्तु सही व्यक्ति की परख एक बार में ही हो जाती है
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“पतिबरता मैली भली गले कांच की पोत 

सब सखियाँ में यों दिपै ज्यों सूरज की जोत “
भावार्थ:- पतिव्रता स्त्री यदि तन से मैली भी हो भी अच्छी है। चाहे उसके गले में केवल कांच के मोती की माला ही क्यों न हो। फिर भी वह अपनी सब सखियों के बीच सूर्य के तेज के समान चमकती है !
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“कहैं कबीर देय तू, जब लग तेरी देह

देह खेह होय जायगी, कौन कहेगा देह “
भावार्थ:- जब तक यह देह है तब तक तू कुछ न कुछ देता रह। जब देह धूल में मिल जायगी, तब कौन कहेगा कि “दो”
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“देह खेह होय जायगी, कौन कहेगा देह

निश्चय कर उपकार ही, जीवन का फन येह “
भावार्थ:- मरने के पश्चात् तुमसे कौन देने को कहेगा ? अतः निश्चित पूर्वक परोपकार करो, यही जीवन का फल है।
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“या दुनिया दो रोज की, मत कर यासो हेत

गुरु चरनन चित लाइये, जो पुराण सुख हेत”

भावार्थ:- इस संसार का झमेला दो दिन का है अतः इससे मोह सम्बन्ध न जोड़ो। सद्गुरु के चरणों में मन लगाओ, जो पूर्ण सुखज देने वाले हैं।

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“गाँठी होय सो हाथ कर, हाथ होय सो देह

आगे हाट न बानिया, लेना होय सो लेह”
भावार्थ:- जो गाँठ में बाँध रखा है, उसे हाथ में ला, और जो हाथ में हो उसे परोपकार में लगा। नर-शरीर के पश्चात् इतर खानियों में बाजार-व्यापारी कोई नहीं है, लेना हो सो यही ले-लो।
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“धर्म किये धन ना घटे, नदी न घट्ट नीर

अपनी आखों देखिले, यों कथि कहहिं कबीर”
भावार्थ:- धर्म परोपकार, दान सेवा करने से धन नहीं घटना, देखो नदी सदैव बहती रहती है, परन्तु उसका जल घटना नहीं। धर्म करके स्वयं देख लो।
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“कहते को कही जान दे, गुरु की सीख तू लेय

साकट जन औश्वान को, फेरि जवाब न देय “
भावार्थ:- उल्टी-पल्टी बात बकने वाले को बकते जाने दो, तू गुरु की ही शिक्षा धारण कर। साकट दुष्टोंतथा कुत्तों को उलट कर उत्तर न दो।
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“कबीर तहाँ न जाइये, जहाँ जो कुल को हेत

साधुपनो जाने नहीं, नाम बाप को लेत “
भावार्थ:-गुरु कबीर साधुओं से कहते हैं कि वहाँ पर मत जाओ, जहाँ पर पूर्व के कुल-कुटुम्ब का सम्बन्ध हो। क्योंकि वे लोग आपकी साधुता के महत्व को नहीं जानेंगे, केवल शारीरिक पिता का नाम लेंगे ‘अमुक का लड़का आया है’।
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“जैसा भोजन खाइये, तैसा ही मन होय

जैसा पानी पीजिये, तैसी बानी सोय “
भावार्थ:- ‘आहारशुध्दी:’ जैसे खाय अन्न, वैसे बने मन्न लोक प्रचलित कहावत है और मनुष्य जैसी संगत करके जैसे उपदेश पायेगा, वैसे ही स्वयं बात करेगा। अतएव आहाविहार एवं संगत ठीक रखो।
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“कबीर तहाँ न जाइये, जहाँ सिध्द को गाँव

स्वामी कहै न बैठना, फिर-फिर पूछै नाँव “
भावार्थ:- अपने को सर्वोपरि मानने वाले अभिमानी सिध्दों के स्थान पर भी मत जाओ। क्योंकि स्वामीजी ठीक से बैठने तक की बात नहीं कहेंगे, बारम्बार नाम पूछते रहेंगे।
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“इष्ट मिले अरु मन मिले, मिले सकल रस रीति

कहैं कबीर तहँ जाइये, यह सन्तन की प्रीति “
भावार्थ:- उपास्य, उपासना-पध्दति, सम्पूर्ण रीति-रिवाज और मन जहाँ पर मिले, वहीँ पर जाना सन्तों को प्रियकर होना चाहिए।
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“कबीर संगी साधु का, दल आया भरपूर

इन्द्रिन को तब बाँधीया, या तन किया धर “
भावार्थ:- सन्तों के साधी विवेक-वैराग्य, दया, क्षमा, समता आदि का दल जब परिपूर्ण रूप से ह्रदय में आया। तब सन्तों ने इद्रियों को रोककर शरीर की व्याधियों को धूल कर दिया। भावार्थात् तन-मन को वश में कर लिया।
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“गारी मोटा ज्ञान, जो रंचक उर में जरै

कोटि सँवारे काम, बैरि उलटि पायन परै

गारी सो क्या हान, हिरदै जो यह ज्ञान धरै “
भावार्थ:- यदि अपने ह्रदय में थोड़ी भी सहन शक्ति हो, ओ मिली हुई गली भारी ज्ञान है। सहन करने से करोड़ों काम संसार में सुधर जाते हैं। और शत्रु आकर पैरों में पड़ता है। यदि ज्ञान ह्रदय में आ जाय, तो मिली हुई गाली से अपनी क्या हानि है ?
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“गारी ही से उपजै, कलह कष्ट औ मीच

हारि चले सो सन्त है, लागि मरै सो नीच “
भावार्थ:- गाली से झगड़ा सन्ताप एवं मरने मारने तक की बात आ जाती है। इससे अपनी हार मानकर जो विरक्त हो चलता है, वह सन्त है, और गाली गलौच एवं झगड़े में जो व्यक्ति मरता है, वह नीच है।
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“बहते को मत बहन दो, कर गहि एचहु ठौर

कह्यो सुन्यो मानै नहीं, शब्द कहो दुइ और “
भावार्थ:- बहते हुए को मत बहने दो, हाथ पकड़ कर उसको मानवता की भूमिका पर निकाल लो। यदि वह कहा-सुना न माने, तो भी निर्णय के दो वचन और सुना दो।
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“बन्दे तू कर बन्दगी, तो पावै दीदार

औसर मानुष जन्म का, बहुरि न बारम्बार “
भावार्थ:- हे दास ! तू सद्गुरु की सेवा कर, तब स्वरूप-साक्षात्कार हो सकता है। इस मनुष्य जन्म का उत्तम अवसर फिर से बारम्बार न मिलेगा।
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“बार-बार तोसों कहा, सुन रे मनुवा नीच

बनजारे का बैल ज्यों, पैडा माही मीच “
भावार्थ:- हे नीच मनुष्य ! सुन, मैं बारम्बार तेरे से कहता हूं। जैसे व्यापारी का बैल बीच मार्ग में ही मार जाता है। वैसे तू भी अचानक एक दिन मर जाएगा।
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“मन राजा नायक भया, टाँडा लादा जाय

है है है है है रही, पूँजी गयी बिलाय “
भावार्थ:- मन-राजा बड़ा भारी व्यापारी बना और विषयों का टांडा बहुत सौदा जाकर लाद लिया। भोगों-एश्वर्यों में लाभ है-लोग कह रहे हैं, परन्तु इसमें पड़कर मानवता की पूँजी भी विनष्ट हो जाती है।
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“बनिजारे के बैल ज्यों, भरमि फिर्यो चहुँदेश

खाँड़ लादी भुस खात है, बिन सतगुरु उपदेश “
भावार्थ:- सौदागरों के बैल जैसे पीठ पर शक्कर लाद कर भी भूसा खाते हुए चारों और फेरि करते है। इस प्रकार इस प्रकार यथार्थ सद्गुरु के उपदेश बिना ज्ञान कहते हुए भी विषय – प्रपंचो में उलझे हुए मनुष्य नष्ट होते है।
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“जीवत कोय समुझै नहीं, मुवा न कह संदेश

तन – मन से परिचय नहीं, ताको क्या उपदेश “
भावार्थ:- शरीर रहते हुए तो कोई यथार्थ ज्ञान की बात समझता नहीं, और मार जाने पर इन्हे कौन उपदेश करने जायगा। जिसे अपने तन मन की की ही सुधि – बूधी नहीं हैं, उसको क्या उपदेश किया?
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“जिही जिवरी से जाग बँधा, तु जनी बँधे कबीर

जासी आटा लौन ज्यों, सों समान शरीर “
भावार्थ:- जिस भ्रम तथा मोह की रस्सी से जगत के जीव बंधे है। हे कल्याण इच्छुक ! तू उसमें मत बंध। नमक के बिना जैसे आटा फीका हो जाता है। वैसे सोने के समान तुम्हारा उत्तम नर – शरीर भजन बिना व्यर्थ जा रहा हैं।
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“साधू ऐसा चाहिये, जैसा सूप सुभाय

सार – सार को गहि रहै, थोथा देई उड़ाय “
भावार्थ:- जैसे अनाज साफ करने वाला सूप होता हैं वैसे इस दुनिया में सज्जनों की जरुरत हैं जो सार्थक चीजों को बचा ले और निरर्थक को चीजों को निकाल दे।
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“माला फेरत जग भया, फिरा न मन का फेर

कर का मनका डार दे, मन का मनका फेर “
भावार्थ:- जब कोई व्यक्ति काफ़ी समय तक हाथ में मोती की माला लेकर घुमाता हैं लेकिन उसका भाव नहीं बदलता। संत कबीरदास ऐसे इन्सान को एक सलाह देते हैं की हाथ में मोतियों की माला को फेरना छोड़कर मन के मोती को बदलो।
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“संत ना छाडै संतई, कोटिक मिले असंत 

चन्दन विष व्यापत नहीं, लिपटत रहत भुजंग “
भावार्थ:- सच्चा इंसान वही है जो अपनी सज्जनता कभी नहीं छोड़ता, चाहे कितने ही बुरे लोग उसे क्यों न मिलें, बिलकुल वैसे ही जैसे हज़ारों ज़हरीले सांप चन्दन के पेड़ से लिपटे रहने के बावजूद चन्दन कभी भी विषैला नहीं होता ।
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“साधु ऐसा चाहिए जैसा सूप सुभाय 

सार–सार को गहि रहै थोथा देई उड़ाय “
भावार्थ:- एक अच्छे इंसान को सूप जैसा होना चाहिए जो कि अनाज को तो रख ले पर उसके छिलके व दूसरी गैर-ज़रूरी चीज़ों को बाहर कर दे ।
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“तन को जोगी सब करे, मन को विरला कोय 

सहजे सब विधि पाइए, जो मन जोगी होए “
भावार्थ:- हम सभी हर रोज़ अपने शरीर को साफ़ करते हैं लेकिन मन को बहुत कम लोग साफ़ करते हैं । जो इंसान अपने मन को साफ़ करता है, वही हर मायने में सच्चा इंसान बन पाता है ।
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“नहाये धोये क्या हुआ, जो मन मैल न जाए 

मीन सदा जल में रहे, धोये बास न जाए “
भावार्थ:- अगर मन का मैल ही नहीं गया तो ऐसे नहाने से क्या फ़ायदा? मछली हमेशा पानी में ही रहती है, पर फिर भी उसे कितना भी धोइए, उसकी बदबू नहीं जाती ।
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“ते दिन गए अकारथ ही, संगत भई न संग 

प्रेम बिना पशु जीवन, भक्ति बिना भगवंत “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते हैं कि जिसने कभी अच्छे लोगों की संगति नहीं की और न ही कोई अच्छा काम किया, उसका तो ज़िन्दगी का सारा गुजारा हुआ समय ही बेकार हो गया । जिसके मन में दूसरों के लिए प्रेम नहीं है, वह इंसान पशु के समान है और जिसके मन में सच्ची भक्ति नहीं है उसके ह्रदय में कभी अच्छाई या ईश्वर का वास नहीं होता ।
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“साधू भूखा भाव का, धन का भूखा नाहिं
धन का भूखा जी फिरै, सो तो साधू नाहिं “
भावार्थ:- कबीर दास जी कहते कि साधू हमेशा करुणा और प्रेम का भूखा होता और कभी भी धन का भूखा नहीं होता। और जो धन का भूखा होता है वह साधू नहीं हो सकता।
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“कुटिल वचन सबतें बुरा, जारि करै सब छार

साधु वचन जल रूप है, बरसै अमृत धार “
भावार्थ:- बुरे वचन विष के समान होते है और अच्छे वचन अमृत के समान लगते है।
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“अति का भला न बोलना, अति की भली न चूप

अति का भला न बरसना, अति की भली न धूप “
भावार्थ:- न तो अधिक बोलना अच्छा है, न ही जरूरत से ज्यादा चुप रहना ही ठीक है। जैसे बहुत अधिक वर्षा भी अच्छी नहीं और बहुत अधिक धूप भी अच्छी नहीं है।
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आशा करता हूँ की आपको यह लेख “kabir ke dohe pdf” बहुत पसंद आया होगा , आपके विचार हमें कमेंट बॉक्स में जरुर बताये |
 धन्यवाद |
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